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Thursday, March 1, 2012

ई एम आई


मार्केट में रोबोटिक्स की
नयी किताब आई है
एक 1000 के नोट की
ज़रूरत बन आई है।

मुस्कुराए, और
1000 के दो नोट थमाए
अरे! तुम्हें नहीं मुस्कुराना है
बाकी का गाड़ी में पेट्रोल भरवाना है।

अगले दिन
मित्र के साथ पहुँचे कॉफ़ी शॉप
हमने उन्हें भी ये बात बताई है कि
मार्केट में रोबोटिक्स की
नयी किताब आई है

मित्र ने इशारा किया,
रोबोटिक्स की किताब
यहीं कॉफ़ी शॉप में ही आई है

हम उठ कर गए
साथ में पुत्र को देख
गदगद हो गए

हम तुम्हें वैज्ञानिक बनाना चाहते हैं
चाँद की सैर करना चाहते हैं
तुम कॉफ़ी शॉप में समय बिता रहे हो
अपने चाँद को पृथ्वी घुमा रहे हो

सच बताओ
सारे पैसे यहीं लगाए हैं
या रोबोटिक्स की
किताब भी लाए हैं

साहब ने किताब निकाली
किताब का जुगाड़ कर लिया
का नाम ले कर
उधार कर लिया

इसी धुरी पर हर बिजनेस
फूल फल रहा है
जुगाड़ के फोर्मुले से
हिंदुस्तान
चल रहा है

अब जुगाड़ से ही काम चलाना
ये उधार खुद ही चुकाना।

पॉकेट में नी नहीं है
आपके पास कमी नहीं है
भला मैं कैसे चुकाऊंगा
किस जुगाड़ से काम चलाऊंगा

यही समय है
समझो क्या है गाढ़ी कमाई
अपनी पॉकेट से ही भरो
किताब की एम आई

Wednesday, February 29, 2012

5 साल

निकल रहे हैं बिलों से
सीधे उतर रहे हैं दिलों में

सातवें मौसम की बयार है
दिग्गज चुनावों के लिए तैयार हैं

रैली, सभाओं मिलने जुलने का दौर है
प्रचार, परचा, झंडे, भाषणों का शोर है

फुटपाथ पर बैठा फटेहाल भिखारी बच्चा
पूछ रहा है...
ये सब क्या हो रहा है,
रोटी, कपडा कम्बल कौन दे रहा है?

बेटा, हम लाचार हैं
देने वाले तो अपने सरकार हैं

ये सरकार कहाँ से आते हैं
हमें रोज़ क्यों नहीं खिलाते हैं?

ये सिर्फ सीज़न में रोट खिलाते हैं
उसी से ये अपने वोट कमाते हैं

बाकी दिन हड़ताल, बन्द, चक्का जाम कराते हैं
इसी से पूरे देश की नैय्या चलाते हैं

जो मिल गया है समेट लो वरना ठगे रह जाएँगे
अपने बिलों से ये पाँच साल बाद लौटकर आयेंगे

Tuesday, February 28, 2012

कोचिंग सेंटर

हमारे पुत्र हमसे कर बोले
पिताजी, इक राज़ की बात खोले

हमने कहा सुनाइए
क्या राज़ की बात है बताइए।

इस एग्जाम में सबका रहा बोलबाला
पर मेरा हो गया है मुह काला।

मैथ्स का साइन कॉज थीटा
फिजिक्स का गामा अल्फा बीटा
पल्ले कुछ नहीं पड़ा, बहुत माथा पीटा

अब कोचिंग से ही किनारा है
वही इक आखिरी सहारा है

हमने झाड़ा...
सारा दिन फ़ोन पर लड़कियों से बतियाते हो
सारी मैथ्स फिजिक्स वहीँ क्यों लगाते हो।

हार कर हम कोचिंग सेंटर पहुँच गए
इतने पप्पुओ को साथ देख दंग रह गए

मास्टर साहब बोले ...
यहाँ पढ़ाने वाले शिक्षक बहुत पुराने हैं
आप गिनिये फीस में कितने शुन्य लगाने हैं

मैंने फ़रमाया, ये बहुत ज्यादा है
यहाँ पढ़ाने में भला क्या फायदा है

बोले...
हमेशा हम नए रिकॉर्ड बनाते हैं और
हर वर्ष सैकड़ो पप्पुओं को पास कराते हैं

Tuesday, January 11, 2011

लट्टू


प्रेरणा स्त्रोत कुछ बच्चे एवं एक लट्टू



बाकी सभी दिंनो की तरह वो भी एक सर्दियों की आम सुबह थी। घर से बाहर निकला तो देखा गली के कुछ बच्चे खेलने में मग्न थे। वे सभी अपने अपने लट्टू चला रहे थे। सभी के अपने अपने तरीके थे। कुछ इस कला के महारथी थे तो कुछ शुरुआती दहलीज़ पर ही थे। मैं खुद भी लट्टू चलाना नहीं जानता था परन्तु मन के किसी कोने में इसे चलाने की इच्छा पनपी। सो देख कर मैंने भी पांच रुपये का निवेश करने का मानस बना लिया। जेब से पांच का सिक्का
निकाल कर बच्चों को ही दे दिया और कहा की सबसे बढ़िया वाला लट्टू खरीद कर लायें।

कुछ देर बाद ही लट्टू मेरे हाथ में था। अब जो नयी बाधा सामने थी वो था इसे चला पाना। मन ही मन हमने एक लट्टू धुरंदर को गुरु माना और शिक्षा लेनी प्रारंभ कर दी। पहले सीखा किस प्रकार से रस्सी को लट्टू के इर्द गिर्द लपेटा जाये। रस्सी लपेटने के मुझे दो तरीके बताए गए। फिर सीखा की किस प्रकार से लट्टू को पकड़ा जाये और उसे फेंका जाये। फेकने के भी अलग अलग प्रकार देख कर मैं दंग था। खैर प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद मैंने हाथ आज़माना शुरू किया। मगर ये क्या, लट्टू छिटक कर इस तरह दूर भागा जैसे कोई तोता पिजरे से आज़ाद हुआ हो। नाचना तो दूर की बात थी।

एक बार, दो बार और फिर कई बार प्रयास किया परन्तु सब निरर्थक साबित हुए। हमने एक दो लट्टू महारथियों से पुनः आग्रह किया कि फिर से अपनी इस कला का प्रदर्शन करे ताकि मैं कुछ बारीकियां पकड़ सकू। कई बार उनके द्वारा चलाने कि प्रक्रिया को गौर से देखा। उनका एक भी वार खली नहीं जाता था। हर थ्रो पर लट्टू मुन्नी कि तरह नाचता और वाहवाही लूटता। और कभी कभी चलते लट्टू को वो अपनी हथेली में उठा लेते। वाकई बड़ा दर्शनीय नज़ारा होता था।

पुनः ठान कर हमने फिर से प्रयास करने का प्रण लिया। डोरी लपेट कर लट्टू जैसे ही छोड़ा नाचने कि बजाय दौड़ पड़ा। खैर जैसे तैसे काबू किया और फिर से प्रयत्न किया। मगर धाक के तीन पात वाली स्थिति हो गयी। लट्टू समझने को तैयार ही नहीं था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि कौन किसे नचाने की कोशिश कर रहा है। एकबारगी तो मुझे अहसास हुआ कि लट्टू चलाने के फेर में मैं कुछ ज्यादा ही नाच गया पर कमबख्त लट्टू बेहया, बेशर्म कहीं टस से मस नहीं हुआ।

मेरी ये संवेदना किसी आम आदमी से कम नहीं है। जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। आप शायद समझ सकते हैं। वो लट्टू लट्टू न लग कर मुझे प्याज़ या लहसुन लग रहा था। जिस प्रकार प्याज़ आम आदमी को रुला रहा है और लहसुन आदमी के सर चढ़ कर नाच रहा है और आम आदमी बेबस लाचार चाह कर भी उसे अपने हाथ में नहीं ले पा रहा है। यही आम आदमी कि रोज़मर्रा कि ज़िन्दगी का असल सच है। यही वो लट्टू है जो धुरंदर खिलाडियों (राजनीतिज्ञों) के हाथ में जा कर किसी अलाद्दीन के चिराग के जिन्न कि भांति एक आज्ञाकारी सेवक बन जाता है। उन्हें पूरा हक़ है वे जब चाहे जहाँ चाहे एवं जिस प्रकार से चाहें लट्टू को अपनी हथेलियों पर भी नचा सकते हैं। ये लट्टू नुमा भारतीय राजनीति एक पीड़ादायी कड़वा सच है जिसका घूँट हमें रोज़ पीना ही है। आखिर जीना है तो इस सच्चाई का सामना हमें न चाह कर भी करना ही होगा।