Monday, January 24, 2011

आईना

दोस्तों,

आज एक और रचना आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। ये राजस्थान पत्रिका, जयपुर में दिनांक ०५ फ़रवरी २००४ को प्रकाशित हुई थी।



कृपया आपकी राय दें।

धन्यवाद्,
आपका अश्विनी ।

Tuesday, January 11, 2011

लट्टू


प्रेरणा स्त्रोत कुछ बच्चे एवं एक लट्टू



बाकी सभी दिंनो की तरह वो भी एक सर्दियों की आम सुबह थी। घर से बाहर निकला तो देखा गली के कुछ बच्चे खेलने में मग्न थे। वे सभी अपने अपने लट्टू चला रहे थे। सभी के अपने अपने तरीके थे। कुछ इस कला के महारथी थे तो कुछ शुरुआती दहलीज़ पर ही थे। मैं खुद भी लट्टू चलाना नहीं जानता था परन्तु मन के किसी कोने में इसे चलाने की इच्छा पनपी। सो देख कर मैंने भी पांच रुपये का निवेश करने का मानस बना लिया। जेब से पांच का सिक्का
निकाल कर बच्चों को ही दे दिया और कहा की सबसे बढ़िया वाला लट्टू खरीद कर लायें।

कुछ देर बाद ही लट्टू मेरे हाथ में था। अब जो नयी बाधा सामने थी वो था इसे चला पाना। मन ही मन हमने एक लट्टू धुरंदर को गुरु माना और शिक्षा लेनी प्रारंभ कर दी। पहले सीखा किस प्रकार से रस्सी को लट्टू के इर्द गिर्द लपेटा जाये। रस्सी लपेटने के मुझे दो तरीके बताए गए। फिर सीखा की किस प्रकार से लट्टू को पकड़ा जाये और उसे फेंका जाये। फेकने के भी अलग अलग प्रकार देख कर मैं दंग था। खैर प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद मैंने हाथ आज़माना शुरू किया। मगर ये क्या, लट्टू छिटक कर इस तरह दूर भागा जैसे कोई तोता पिजरे से आज़ाद हुआ हो। नाचना तो दूर की बात थी।

एक बार, दो बार और फिर कई बार प्रयास किया परन्तु सब निरर्थक साबित हुए। हमने एक दो लट्टू महारथियों से पुनः आग्रह किया कि फिर से अपनी इस कला का प्रदर्शन करे ताकि मैं कुछ बारीकियां पकड़ सकू। कई बार उनके द्वारा चलाने कि प्रक्रिया को गौर से देखा। उनका एक भी वार खली नहीं जाता था। हर थ्रो पर लट्टू मुन्नी कि तरह नाचता और वाहवाही लूटता। और कभी कभी चलते लट्टू को वो अपनी हथेली में उठा लेते। वाकई बड़ा दर्शनीय नज़ारा होता था।

पुनः ठान कर हमने फिर से प्रयास करने का प्रण लिया। डोरी लपेट कर लट्टू जैसे ही छोड़ा नाचने कि बजाय दौड़ पड़ा। खैर जैसे तैसे काबू किया और फिर से प्रयत्न किया। मगर धाक के तीन पात वाली स्थिति हो गयी। लट्टू समझने को तैयार ही नहीं था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि कौन किसे नचाने की कोशिश कर रहा है। एकबारगी तो मुझे अहसास हुआ कि लट्टू चलाने के फेर में मैं कुछ ज्यादा ही नाच गया पर कमबख्त लट्टू बेहया, बेशर्म कहीं टस से मस नहीं हुआ।

मेरी ये संवेदना किसी आम आदमी से कम नहीं है। जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। आप शायद समझ सकते हैं। वो लट्टू लट्टू न लग कर मुझे प्याज़ या लहसुन लग रहा था। जिस प्रकार प्याज़ आम आदमी को रुला रहा है और लहसुन आदमी के सर चढ़ कर नाच रहा है और आम आदमी बेबस लाचार चाह कर भी उसे अपने हाथ में नहीं ले पा रहा है। यही आम आदमी कि रोज़मर्रा कि ज़िन्दगी का असल सच है। यही वो लट्टू है जो धुरंदर खिलाडियों (राजनीतिज्ञों) के हाथ में जा कर किसी अलाद्दीन के चिराग के जिन्न कि भांति एक आज्ञाकारी सेवक बन जाता है। उन्हें पूरा हक़ है वे जब चाहे जहाँ चाहे एवं जिस प्रकार से चाहें लट्टू को अपनी हथेलियों पर भी नचा सकते हैं। ये लट्टू नुमा भारतीय राजनीति एक पीड़ादायी कड़वा सच है जिसका घूँट हमें रोज़ पीना ही है। आखिर जीना है तो इस सच्चाई का सामना हमें न चाह कर भी करना ही होगा।

Saturday, January 1, 2011

स्वागतम नव वर्ष

प्यारे दोस्तों

नव वर्ष के आगमन पर सभी को ढेर सारी शुभकामनाएँ । नव वर्ष के सन्दर्भ में एक छोटी सी रचना आप सभी को समर्पित है।

पावन शीत बयार लिए
आई नूतन भोर

उजियारा नए साल का
बिखरा चारो ओर

दृढ निश्चय संकल्प की
बांधें ऐसी डोर

गतिमय प्रगति पथ का
बचे कोई छोर

जीवन सफल सुयश रहे
है प्रार्थना भाव विभोर

सधन्यवाद,
आपका अश्विनी।

Thursday, January 14, 2010

नया साल

प्रिय दोस्तों,

१३ जनवरी २०१० को समाचार पत्र "डेली न्यूज़" में मेरी ग़ज़ल "नया साल" प्रकाशित हुई। रचना आपके समक्ष प्रस्तुत है। आपके सुझाव एवं विचार सादर आमंत्रित हैं।



आपका,
अश्विनी बग्गा।

Saturday, January 9, 2010

भक्ति की राह

मकरन्दी लाल का रोज़ का नियम था, हर सुबह नहा धो कर तैयार होता और पहुँच जाता शिव मंदिर। बड़े प्रेम से प्रभु की पूजा अर्चना करता, जल चढ़ाता और प्रार्थना करता की उसके पास वह सभी हो जो वह चाहता है। तत्पश्चात अपनी साईकिल उठता और काम पर चल देता। उसकी भक्ति देख कर प्रभु प्रसन्न हुए और उसे तरक्की दिला दी। मकरन्दी ने फटफटी खरीद ली और साईकिल को किनारा कर दिया।

उसका रोज़ का नियम जारी रहा, पूजा पाठ के बाद वही मन्नत मांगता जो पहले माँगा करता था। कुछ समय बाद प्रभु को लगा शायद इससे इसका काम नहीं चल रहा, चलो थोडा भला और कर दिया जाये। कुछ समय पश्चात् मकरन्दी की दूसरी नौकरी लगी। अच्छी तनख्वाह हो गयी परन्तु काम का बोझ और समय दोनों बढ़ गया। एक छोटा घर खरीदा और एक चोपहिया वाहन भी ले लिया।

समय की कमी हो गयी, काम बढ़ गया, दूरी ज्यादा हो गयी। इसी वजह से मकरन्दी की दिनचर्या में तबदीली होने लगी। कुछ समय के बाद वह मंदिर भी यदा कदा जाने लगा। इस बात का अहसास प्रभु को हुआ की जिस वजह से उसने तरक्की की है उसी वजह को वह अनदेखा कर के जीवन व्यापन करने में जुटा हुआ है। प्रभु ने सोचा, लगता है मकरन्दी को याद दिलाने का सही समय आ गया है।

एक दिन मकरन्दी सुबह अपने दफ्तर जाने के लिए मंदिर के सामने से तेजी से निकल गया। प्रभु ने जाते हुए देख लिया। जैसे ही वह चौराहे पर पहुंचा तभी अचानक सामने से आते एक ट्रक ने उसे टक्कर मार दी। मकरन्दी की कार तहस नहस हो गयी। पर ये चमत्कार ही था की मकरन्दी सही सलामत था। वह कैसे बचा कोई नहीं जनता था। सारा तमाशा प्रभु देख रहे थे, व अन्दर ही अन्दर मुस्कुरा भी रहे थे। "चलो अब तो फिर लौट कार आएगा मेरे द्वार, देखता हूँ।"

अगले ही दिन मकरन्दी मंदिर में हाजिर हो गया। वह हाथ जोड़े भागवान की प्रतिमा के आगे खड़ा था। तभी उसने बोलना शुरू किया - "भगवन, छोड़ना नहीं उस पापी दुष्ट को। मेरी नई नवेली कार को उसने एक मिनट में कबाड़ में तब्दील कर दिया। उसकी रिपोर्ट दर्ज करा दी है। कड़ी से कड़ी सजा दिलवाना उसे हाँ। और प्रभु मैंने बीमा कंपनी में भी फाइल लगवा दी है। थोडा जल्दी करना प्रभु क्लेम फटाफट पास करवाना। अब खटारा फटफटिया पर जाना मेरी शान को शोभा नहीं देता। आखिर दफ्तर में मेरा भी कुछ रुतबा है। याद रखना प्रभु, उस ट्रक ड्राईवर को बख्शना मत। ठीक है अब चलता हु प्रभु। "

मकरन्दी लाल सब कह कर निकल लिया। भगवान का मस्तिष्क चकराने लगा। वो सोच में पड़ गए। जिस इन्सान की इतनी भीषण दुर्घटना हो और वह बच जाये तो बजाये शुक्रिया अदा करने के वह ट्रक ड्राईवर का बुरा सोच रहा है। क्लेम के लिए चिंतित है, बार बार ये कह रहा है कि उसे छोड़ना मत। उफ़ मैंने भी किसकी मदद की। किसे वापस बुलाने चला था। अब तो उसका मन ही बदल गया है, मैं चाह कर भी उसे दुबारा भक्ति के रास्ते पर नहीं ला सकता।

अंततः प्रभु ने मकरन्दी को उसी के हाल पर छोड़ दिया।